September 17th, 2007 · Comments Off
अपनी शादी के बाद अपने पीताजी को यह कविता पत्र मे लिख कर दिया था... माँ कहती है उनके आँख मे आंसू आ गय...
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September 13th, 2007 · Comments Off
लीलाधर जगूड़ी की एक कविता
एक बुढिया का इच्छागीत
जब मैं लगभग बच्ची थी
हवा कितनी अच्छी थी
घर से जब बाहर को आयी
लोहार ने मुझे दरांती दी
उससे मैंने घास काटी
गाय ने कहा दूध पी
दूध से मैंने, घी निकाला
उससे मैंने दिया जलाया
दीये पर एक पतंगा आया
उससे मैंने जलना सीखा
जलने में जो दर्द हुआ तो
उससे मेरे आंसू आये
आंसू का कुछ [...]
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September 12th, 2007 · Comments Off
शैलेन्द्र की एक कविता
नया साल
देर रात पटाखे छूटे
टकराए जाम से जाम
चुंबनों के दौर चले
थिरके कई-कई पांव
चहल-पहल जारी रही
लगे जिस्मों के दाम
बड़े-बड़े सट्टे लगे
फिटे साहब-बीबी-गुलाम
दुल्हन-सी सजी रात का किस्सा
इस तरह हुआ तमाम !
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कवि परिचय : जनसत्ता के कोलकाता संस्करण के प्रभारी सम्पादक . तीन काव्य संकलन प्रकाशित .
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September 11th, 2007 · Comments Off
आदमकद
मेरी कविता का
विषय है महानगर का
एक आदमकद व्यक्तित्व
जिसके भीतर जिन्दा हैं
खेत-खलिहान-चौपाल
एक पुश्तैनी घर और चौबारा
यानी अजनबी चेहरों की भीड़ नहीं
समस्याओं से जूझता गांव सारा
उसके अन्दर बहती है स्नेह की गंगा
वह आस्थाओं का विशाल बरगद है
कि उसकी छाया तले
हर व्यक्ति निरापद है
शहर के आवरण वाले लिफाफों में
वह अकेला पोस्टकार्ड है
जिसे आप बेखटके बांच सकते हैं
व्यक्ति एक [...]
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September 10th, 2007 · Comments Off
लीलाधर जगूड़ी की एक कविता
प्रश्न
धर्म में भगवान होते हैं
या भगवानों के भी अपने कुछ धर्म ?
क्यों मरना पड़ता है
क्यों जन्म लेना पड़ता है भगवान को भी ?
क्या जड़ ही दीर्घायु होते हैं
अपने को और अधिक गुलाम बनाने के लिए
भगवान ही हमारा सर्वोच्च मालिक क्यों हो ?
जबकि जन्म हमने लिया,मरना हमें है
क्या हमारी समस्याएं ही उसके [...]
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September 7th, 2007 · Comments Off
शबरी घोष की एक बांग्ला कविता
अनुवाद : समीर रायचौधुरी
जो स्वप्न पूरे नहीं हुए
मैं तुम्हें तीर्थ घुमाने ले जाऊंगी मां
गोमुख की पवित्र धारा में छोड आऊंगी तुम्हारी अस्थियां
तुम्हारे विश्वास और तुम्हारा अन्तिम सपना …
अगर पुनर्जन्म है मां
तब फिर लौटना मेरी गोद में बेटी बनकर
तुम्हारी नादान उंगलियों को पकड़
तुम्हें सिखाऊंगी चलना
पहचान कराऊंगी नदी आकाश मनुष्य और उनके [...]
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September 6th, 2007 · Comments Off
शुभकामनाएं
आस्था
यदि शब्द पर हो
काव्य पर हो
सृजन पर हो
तो व्यक्ति पर भी
होनी लाज़िमी है
अन्यथा
आस्था में स्नेह में
शुभकामना में
अवश्य कोई
कमी है
विश्वासरहित
शुभकामनाएं
शब्द हैं खोखले
और निष्प्राण
निरी छलना है
अशुद्ध मंत्रों वाले
यज्ञ में
अपवित्र समिधाओं का
जलना है
भावनाएं यदि
सत्यता की
सौगंध लिए
घूंघट खोलना ही चाहती हों
तो उनका उचित
सम्मान भी होना चाहिए
शुभकामनाएं
यदि अन्तर्मन से हों
तो उन पर नाम भी
होना चाहिए ।
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September 5th, 2007 · Comments Off
दर्द
देखो शाम घर जाते बाप के कंधे पर
बच्चे की ऊब देखो
उसको तुम्हारी अंग्रेज़ी कह नहीं सकती
और मेरी हिंदी भी कह नहीं पाएगी
अगले साल ।
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September 4th, 2007 · Comments Off
भवानी भाई की एक कविता
अपमान
अपमान का
इतना असर
मत होने दो अपने ऊपर
सदा ही
और सबके आगे
कौन सम्मानित रहा है भू पर
मन से ज्यादा
तुम्हें कोई और नहीं जानता
उसी से पूछकर जानते रहो
उचित-अनुचित
क्या-कुछ
हो जाता है तुमसे
हाथ का काम छोड़कर
बैठ मत जाओ
ऐसे गुम-सुम से !
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September 3rd, 2007 · Comments Off
हिन्दी है मालिक कीतब आज़ादी से लड़ने की भाषा फिर क्या होगी?हिन्दी की माँगअब दलालों की अपने दास-म...
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September 3rd, 2007 · Comments Off
भारतत्व
गांवों में समाजवाद, शहरों में पूंजीवाद, दफ़्तर में सामन्तवाद
घर में अधिनायकत्व है
कभी-कभी लगता है
यही भारतत्व है ।
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August 31st, 2007 · Comments Off
ग्यारह सितम्बर
॥१॥
अमेरिकी मान बैठे थे –
इतिहास का अंत हो चुका
संस्कृति टीवी के पर्दे में सिमट गई
और प्रतिद्वंद्वी दूसरे ग्रहों से आएंगे
ग्यारह सितम्बर ने बताया –
जिस दुनिया को चाटते रहे हैं
जाहिली,गरीबी और शोषण के दीमक
उसी दुनिया में उन्हें भी रहना है ।
॥२॥
अगर अल्लाह ने
तालिबान की फतह चाही होती
तो क्रूज़ मिसाइलें अमेरिका को देता ?
अगर मुनाफ़ा ही
दुनिया [...]
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August 26th, 2007 · Comments Off
१- टेस्ट ट्यूब बेबी तो अभी जन्में हैं,
ये बनावटी लोग कहां से आते हैं।
बनावटी चेहरों की नकल करते-करते,
असली चेहरा ही भूल जाते हैं॥
२- चेहरे पर सच्चाई का नूर नहीं,
बेईमानी का लबादा है।
झूठ में रात-दिन गुजारते हैं,
पूरा करते नहीं अपना वादा है॥
३- क्या हुआ [...]
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August 18th, 2007 · Comments Off
यह नारद के कोड़ को लेकर की गई है। साथ में एक फोटों भी दे रहा हूँ। ताकि यह पोस्ट व्यर्थ न जाये :) सब ...
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August 17th, 2007 · Comments Off
जी हाँ, गोडैडी 99 सेंट का डोमेन बेच रहा है, पर केवल डॉट-इन्फो (.info)। मैं ने एक डोमेन खरीदा जो टैक्स आदि मिला कर 1.24 का पड़ा - यानी 55 रुपए के करीब। है न अच्छा सौदा? डोमेन बुक कीजिए और उसे ब्लॉगर पर मुफ्त होस्ट कीजिए।
बस समस्या यह है ...
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August 17th, 2007 · Comments Off
Its never just a game when you’re winning.
- George Carlin
अब चूँकि हम हार गए हैं, तो हम कह सकते हैं कि इट्स जस्ट ऍ गेम।
बीबीसी पर मुकुल केशवन पूछते हैं, क्या भारत की हार क्रिकेट के लिए फ़ायदेमंद है? मुकुल का तर्क बिल्कुल सही है। वे भारत और पाकिस्तान के ...
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August 17th, 2007 · Comments Off
मोहल्ला हिन्दी चिट्ठा जगत में एक कैन्सर बन कर उभर रहा है -- ऐसा कैन्सर जिस का कोई इलाज नहीं लग रहा। इस चिट्ठे का और इस से जुड़े कुछ और चिट्ठों का एक ही मकसद है - हिन्दी चिट्ठाकारों और पाठकों को हिन्दू मुस्लिम झगड़े में उलझाना। हम लोग ...
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August 17th, 2007 · Comments Off
कुछ दिन पहले मुझे अपने चिट्ठे के हिट-काउंटर पर दिखा कि मेरी परिणीता फिल्म पर लिखी प्रविष्टि पर कोई पाठक जापानी साइट से आया है। वहाँ देख कर अच्छा लगा कि कई चिट्ठे जापानी भाषा में ऐसे लिखे जा रहे हैं जो भारत पर आधारित हैं। यह चिट्ठे भारतीयों के ...
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August 17th, 2007 · Comments Off
गूगल डेस्कटॉप का नवीनतम संस्करण (ver. 5) अब 29 भाषाओं में है, और इस में पहली बार हिन्दी को भी जोड़ा गया है। समाचार यहाँ पर पढ़े।
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August 17th, 2007 · Comments Off
इंटरनेट पर, किसे मालूम है कि आप एक कुत्ता नहीं हो। या फिर यह कि आप फिर वही कुत्ता नहीं हो।
यदि आप को मेरा अनुवाद समझ में नहीं आया, तो यह रहा टी.वी. रमण रामन का मूल कथन
On the Internet, no one knows you aren't a dog! Nor even if ...
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August 17th, 2007 · Comments Off
कल परसों मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ 2006 के सर्वश्रेष्ठ उदीयमान चिट्ठाकार (तरकश सम्मान प्राप्त) और इंडीब्लॉगीज़-2006 के सर्वोत्तम हिन्दी ब्लॉगर से मिलने का। जी हाँ, टोरोंटो की अपनी संक्षिप्त यात्रा के दौरान, मुझे उड़नतश्तरी की स्वर्ण-कलम के पीछे छिपे स्वर्णिम व्यक्तित्व के स्वामी समीर लाल जी से और उन के ...
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August 17th, 2007 · Comments Off
इस विषय पर यदि चिट्ठाजगत में पहले ही किसी ने सूचना दी हो तो क्षमा करें। आज कई दिनों बाद चिट्ठा लिख रहा हूँ। पिछले दिनों से व्यस्तता के कारण नियमित रूप से चिट्ठे पढ़ भी नहीं पा रहा हूँ, हालाँकि उठ रहे भूचाल से अनभिज्ञ भी नहीं हूँ।
कल ही ...
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August 17th, 2007 · Comments Off
मैं ने पिछली बार एक प्रविष्टि लिखी थी गूगल में काम करने वाले नेत्रहीन वेब-वैज्ञानिक डा. टी.वी. रामन के बारे में। तब डा. रामन ने गूगल के आधिकारिक ब्लॉग पर अपनी प्रविष्टि में यह बताया था कि वे किस प्रकार गूगल का प्रयोग किसी व्यक्तिवाचक संज्ञा के सही हिज्जे पता ...
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August 17th, 2007 · Comments Off
[आज जुलाई का अन्तिम दिन है। यदि आज मैं यह प्रविष्टि नहीं लिखता तो इस चिट्ठे की पौने तीन वर्ष की आयु में पहला महीना ऐसा चला जाता जिस में कुछ भी न लिखा गया हो। अपने चिट्ठे को सुप्तावस्था से बाहर लाने की कोशिश है यह प्रविष्टि, जो मैं ...
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August 16th, 2007 · Comments Off
आज तो कुछ लिखने का मन ही नहीं है. रात हो गई है.अँधेरा घिर आया है. मैं घर के पिछवाड़े में निकल कर लॉन मे...
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